श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यजी के ज्येष्ठात्मज

श्रीमहाप्रभुवल्लभाचार्यजी के ज्येष्ठात्मज श्रीगोपीनाथजी का जीवन चरित्र

श्रीमहाप्रभुजी के ज्येष्ठपुत्र श्रीगोपीनाथजी का प्राकट्य वि0 सम्वत् 1568 के आश्विन कृष्ण द्वादशी के दिन शुभ मुहूर्त में भारत के हृदयस्थल में स्थित गंगा यमुना एवं सरस्वती के पवित्र संगम के निकट स्थित देवर्षि (देवरख) गांव के पास संगम स्थल के तट पर अवस्थित अड़ैल (अलर्कपुर) ग्राम में हुआ। कुछ इतिहासज्ञ वि.सं.1567 भी स्वीकार करते है, आपश्री के प्राकट्य का पुष्ट प्रमाण अष्टछाप भगवदीय श्रीकृष्णदासजी के पद से प्राप्त होता है।

‘‘घर घर आनन्द होत बधाई। श्रीवल्लभगृह प्रगटभयै हैं गोपीनाथ कुंवर सुखदाई।

   धन्य धन्य आसो वद दिन द्वादसी धन्य-धन्य वार नक्षत्र कहाई।।’’

इत्यादि।

अपने महान् पूर्वजों के द्वारा शत सोमयज्ञों के फलस्वरूप साक्षात् शेषावतार प्रमाणस्वरूप श्रीगोपीनाथजी प्रकट हुए। आपश्री का यज्ञोपवीत श्रीवल्लभाचार्यजी ने पांच वर्ष की आयुष्य में चातुर्मास्य के उपरान्त वि0 सं0 1573 में काशीपुरी में विधिवत् सम्पन्न किया। उपनयन संस्कार के बाद आपने अपने पिता श्रीमद्धल्लभाचार्यजी के कुशल निर्देशन एवं देखरेख में प्राचीन परम्परानुसार वेद वेदान्त आदि सकलशास्त्रों का अध्ययन किया तथा साम्प्रदायिक ग्रन्थों विशेष कर अणुभाष्य, सुबोधिनी आदि का अध्ययन आपने अपने पितृचरण श्रीमहाप्रभुजी से प्राप्त किया। आपश्री शान्त एवं गभ्भीर प्रकृति के विद्वान् थे। आपकी रूचि ग्रन्थानुशीलन एवं तीर्थयात्रा में अधिक थी। वि0 सम्वत् 1572 में श्रीविट्ठलनाथजी के प्राकट्य एवं जातकर्म संस्कार होने के पश्चात् श्रीमहाप्रभुजी दोनों बालकों को लेकर श्रीगिरिराज पधारे तथा दोनों बालकों को ‘‘श्रीनाथजी’’ का चरण स्पर्श कराया, तब तक श्रीआचार्यचरण ने षट् सोम यज्ञ पूर्ण कर लिये थे। बाल्यकाल से ही उनकी प्रतिभा प्रस्फुटित होते हुए जन-जन को दिखायी पड़ने लगी थी। अध्ययन के साथ ही आध्यात्मिक ग्रन्थों के पठन-पाठन में उनकी रूचि बढ़ने लगी। किशोरवय में पहुंचने के बाद ही आपश्री ने यह नियम बना लिया कि नित्यप्रति सेवा आदि से निवृत्त होकर सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत का पाठ करने के पश्चात् ही प्रसाद ग्रहण करना। अत्यन्त श्रमसाध्य उनके इस नियम को देखकर परम कारूणिक श्रीमहाप्रभुजी ने विचार किया कि कोई ऐसा उपाय किया जाये जिससे उनका नियम भी पूर्ण हो जाये एवं पुष्टिमार्ग के सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार तथा जीवों के कल्याण एवं उद्धार के लिये भी उनको समय मिल जाये। एतदर्थ श्रीमहाप्रभुजी ने श्रीमद्भागवत के द्वादश  स्कन्धों के अनुसार विविध लीलाओं पर आधारित श्रीपुरुषोत्तम के दिव्य सहस्त्रनामों की रचना की जो ‘‘श्रीपुरुषोत्तमसहस्त्रनाम’’ के नाम से विख्यात हुयी। इसके पाठ से सम्पूर्ण श्रीमद्भावगत के पाठ का पूर्ण फल प्राप्त होता है। तत्पश्चात् श्रीगोपीनाथजी इसी पुरुषोत्तमसहस्त्रनाम का नित्यप्रति पाठ करके अपने शेष उत्तरदायित्वों को पूर्ण करने में सन्नद्ध हुए।

श्रीमद्धल्लभाचार्यचरण के सरल सात्विक अध्ययनशील विद्धतापूर्ण जीवन, त्यागवृत्ति, अपरिग्रहभाव आदि का सम्पूर्ण प्रभाव श्रीगोपीनाथजी के जीवन पर पड़ा था। विक्रम सम्वत् 1581 से 1584 के बीच आपका विवाह सम्पन्न हुआ। आपके बहूजी का नाम पायम्माजी प्रसिद्ध है। आपका द्विरागमन श्रीवल्लभाचार्यचरण के लीलाप्रवेश के पूर्व ही हो चुका था। आपश्री के दो सन्तति हुयी। ऐसा इतिहासज्ञों का मानना है परन्तु पुष्टिमार्गीय इतिहासज्ञ तीन मानते हैं। उनमें प्रथम पुत्र श्रीपुरुषोत्तमजी का प्राकट्य वि0 सं0 1587 अथवा 1588 में मि0 आश्विन कृष्ण अष्टमी को हुआ। द्वितीय सन्तति पुत्री श्रीसत्यभामा बेटीजी प्रा0 वि0 सं0 1598 मि0 का0 शु0 7-अड़ैल में हुयीं तथा तृतीय संतति लक्ष्मीबेटीजी हुयीं जिनका जन्म वि0 सं0 1601 मानते हैं।

वि0 सम्वत् 1587 में श्रीआचार्यचरण ने अपनी लीला सम्वरण का समय आया जानकर श्रीगोपीनाथजी को अपना आवष्यक उपदेश एवं निर्देश दिया तथा सम्प्रदाय का उत्तरदायित्व सौंप दिया। प्रयाग से संन्यास ग्रहण करने के पश्चात् श्रीमहाप्रभुजी ने काशी में हनुमानघाट पर अपने अन्तिम 40 दिन व्यतीत किये। उस समय श्रीगोपीनाथजी एवं श्रीविट्ठलनाथजी काशी पधारे तब श्रीमहाप्रभुजी संन्यास ले चुके थे। अतः उन्होंने अपना अन्तिम उपदेश लिखकर के दिया जो सम्प्रदाय में ‘शिक्षा श्लोकी” के नाम से प्रसिद्ध है।

आचार्यचरण के नित्यलीला प्रवेश के पश्चात् अपनी माताजी के साथ श्रीगोपीनाथजी एवं श्रीविट्ठलनाथजी काशी से अड़ैल में पधारकर निवास करने लगे एवं पुष्टिमार्ग के आचार्य के रूप में श्रीगोपीनाथजी साम्प्रदायिक गतिविधियों का संचालन करने लगे।

अड़ैल के निवास के समय श्रीनाथजी के मन्दिर के कृष्णदास अधिकारी से सूचना मिली कि यहां बंगाली वैष्णव जो श्रीनाथजी की सेवा करते हैं वे द्रव्य का दुरूपयोग करते हैं एवं श्रीनाथजी के निकट देवी की मूर्ति को पधरा दिया है। यह सूचना प्राप्त होने पर दोनों भाई श्रीजीद्वार गोपालपुरा (जतीपुरा) पहुंचे एवं कृष्णदास को बंगाली वैष्णवों को श्रीजी की सेवा से हटाने का निर्देश दिया। तदनुसार बंगाली वैष्णवों को हटाया गया एवं श्रीगोपीनाथजी एवं श्रीविट्ठलनाथजी ने सांचोरा (सांचीहर) ब्राहा्रणों को सेवा का उत्तरदायित्व सौंपा जो आज तक चला आ रहा है। श्रीगोपीनाथजी ने ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि स्वयं तथा श्रीविट्ठलनाथजी में से एक भाई अवश्य गोपालपुरा (जतीपुरा) श्रीनाथजी की सेवा में विराजते रहे।

श्रीगोपीनाथजी ने तत्पश्चात् गुजरात सिन्ध एवं द्वारिका की यात्रा किया एवं उससे प्राप्त लगभग एक लाख के द्रव्य से चांदी सोने के पात्र आभूषण आदि बनवाकर श्रीजी को भेंट किया। यात्रा के समय आपश्री ने श्रीवल्लभसम्प्रदाय का प्रचार एवं वैष्णव सृष्टि में वृद्धि किया।

वि0 सम्वत् 1594 के प्रारम्भ में श्रीगोपीनाथजी ने जगन्नाथपुरी की यात्रा किया एवं अपने पिताश्री के समकालीन वृद्ध पुरोहित श्रीकृष्णदास गुच्छिकार के मुख से श्रीवल्लभाचार्यजी की वि0 सं0 1545 में जगदीश पधारने एवं मन्दिर में शास्त्रार्थ होने का पूर्ण वृतान्त सुना तथा उनको अपनी वंशपरम्परा का पुरोहित भी स्वीकार कर बैशाख कृष्ण अमावस्या को वृत्तिपत्र लिख दिया। इस वृत्तिपत्र में श्रीवल्लभाचार्यजी की 1545 की जगन्नाथपुरी यात्रा एवं शास्त्रार्थ का भी उल्लेख किया है।

जगदीश यात्रा के पश्चात् अनेकानेक स्थलों का परिभ्रमण कर स्वसम्प्रदाय का प्रचार एवं अनेक जीवों को सनाथ करते हुए आप पुनः अड़ैल पधारे एवं सम्वत् 1601 में अड़ैल में ही सोमयज्ञ एवं विष्णुयज्ञ किया। सम्वत् 1605 में अपने भ्रातृज श्रीविट्ठलनाथजी के पुत्र श्रीगिरिधरजी के यज्ञोपवीत में काशी पधारे, तत्पश्चात् पुनः आप पधाकर श्रीजी की सेवा में पधारे तथा व्रज 84 कोस की परिक्रमा विधिविधान से पूर्ण किया।

वि0 सम्वत् 1618 में श्रीगोपीनाथजी ने दूसरी बार गुजरात सिंध एवं द्वारिका की यात्रा किया जिसमें लगभग दो वर्ष लगा।

श्रीगोपीनाथजी एवं श्रीविट्ठलनाथजी का परस्पर अत्यन्त सौहार्द पूर्ण सम्बन्ध था। दोनों भ्राताओं में प्रायः पत्र व्यवहार होता रहता था। जो संस्कृत तथा तेलगू में ही होता था। श्रीविट्ठलनाथजी अपने ज्येष्ठ भ्राता को बड़ी आदर की दृष्टि से देखा करते थे। जैसाकि उनके द्वारा रचित ‘यदनुग्रहतो जन्तु’ इत्यादि मंगलाचरण से ज्ञात होता है।

श्रीगोपीनाथजी के द्वारा रचित निम्नलिखित ग्रन्थों का उल्लेख प्राप्त होता हैं-

1. साधनदीपिका

2. नित्य सेवा विधि

3. नाम निरूपण संज्ञा

4. वल्लभाष्टक

5. उपदेश वचनामृतपुष्टि

उपरोक्त में से प्रथम ‘‘साधनदीपिका’’ एवं ‘सेवाविधि’ को छोड़कर अन्य कोई भी ग्रन्थ सम्प्रति-अद्यावधि उपलब्ध नहीं है। आप की अगाध विद्धत्ता एवं जानकारी के अनुसार इनके अतिरिक्त और भी अनेकानेक रचनाएं आपकी अवश्य रही होंगी ऐसी सम्भावना है। आपके लीला प्रवेश के पश्चात् आपकी बहुजी (पत्नी) आपके सभी ग्रन्थों को लेकर दक्षिण में अपने मातृपितृगृह में चली गयीं जहां उन ग्रन्थों की रक्षा न हो सकी। इसके बाद कोई विवरण उन ग्रन्थों का नहीं प्राप्त हो सका। ऐसी सम्भावना है कि इन्हीं में से इनके द्वारा रचित अन्य ग्रन्थ भी रहे होंगे।

अपने प्रदेश प्रवास के समय अथवा अपने घर पर लौटने पर जब आपको अपने एक मात्र पुत्र के निधन का समाचार प्राप्त हुआ तो आपका मन संसार से विरक्त हो गया। आपने सम्प्रदाय का उत्तरदायित्व श्रीविट्ठलनाथजी को सौंप दिया एवं वि0 सं0 1620 में श्रीजगन्नाथपुरी की यात्रा के लिये निकल पड़े और वहीं पर श्रीबलदेवजी के मुखारविन्द में सदेह लीन हो गये। वल्लभसम्प्रदाय की आचार्य परम्परा में चार स्वरूप भगवत्स्वरूप में साक्षात् प्रवेश किये जिसका प्रमाण घरूवार्ता से प्राप्त होता है। “चार स्वरुप भगवद स्वरुप में लीन भये सो या रीती सो जो एक श्री आचार्यजी महाप्रभु श्रीगंगाजी के प्रवाह में २ श्रीपुरुषोत्तमजी  को श्रीनाथजी ने हाथ पकरिके अपनी लीला में पधराये     ३ श्रीगोपीनाथजी आप  श्रीजगदीश पधारे हते  तहां बलदेवजी के स्वरुप में लीन भये  ४ श्रीगिरिधरजी श्रीमथुरानाथजी के मुखारबिन्द में समाय गये या रीती सौ सब लीला में पधारे  ।

यह सप्रमाण सिद्ध है कि जब-जब कोई पुरुषोत्तम स्वरूप से भगवद् अवतार होता है तब-तब अनन्तरूप भगवान् ‘शेष’ भी उनके साथ अवतार ग्रहण करते हैं। रामावतार में भगवान् शेष ने लघुभ्राता श्रीलक्ष्मण के रूप में अवतार ग्रहण किया। कृष्णावतार में ज्येष्ठ भ्राता श्रीगोपीनाथजी के रूप में उनका शेषावतार हुआ। जैसा कि निजवार्ता से प्रमाणित है- तहाँ श्रीआचार्य श्रीमहाप्रभु ने श्रीगोकुल में श्री बलदेवजी के संग क्रीड़ा करत श्रीठाकुरजी के दर्शन किये तब आप मन में विचारे जो श्रीठाकुरजी की ऐसी इच्छा दिसत है जो हम दोउ तुम्हारे घर प्रकट होइंगे , आप ऐसी इच्छा जानि के आपके मन में बोहोत आनंद भयो ।   बलदेवजी है तिनको नाम तो श्रीगोपीनाथजी  धरेंगे वे साक्षात वेद को स्वरुप है   सो देवमार्ग को विस्तार करेंगे और श्रीविट्ठलनाथजी सो तो नन्दकुमार है , अपने जो देवी जीव भगवदी  है जिनको परमानन्द को दान करेंगे ।

श्रीगोपीनाथजी शेषावतार बलदेवजी के स्वरूप है और श्रीगुंसाईजी यशादोत्संग लालित श्रीनन्दकुमार के स्वरूप हैं। उभयत्र बड़े भ्राता के रूप में प्राकट्य होने का कारण भी निजवार्ता से स्पष्ट होता है। ‘‘आपके घर बलदेवजी प्रथम प्रगट भये। काहेते जो श्रीबलदेवजी है सो श्रीठाकुरजी को धाम हैं, अक्षरब्रह्म हैं, और साक्षात् शेष महानाग हैं, जब प्रथम सिघांसन शैया सिद्धि होई तब श्रीठाकुरजी पधारे। तातें श्रीबलदेवजी श्रीगोपीनाथजी होय के अड़ैल में प्रगट भये’’। इस समय श्रीमहाप्रभुजी ने आयुष्य के बत्तीस वर्ष अंगीकार किये थे। ऐसे महान् विभूतिस्वरूप महान् आचार्य श्रीगोपीनाथजी के श्री चरणों में हम सादर सविनय वन्दन एवं नमन करते हैं।

श्रीगोपीनाथजी के जीवनकाल की कुछ ऐसी विलक्षण घटनाएं हैं जिनके माध्यम से आपश्री ने समग्र वैष्णवजनों को सावधान किया है। यथा निजवार्तानुसार महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य चरण शीतकाल में ब्रह्ममुहूर्त में जगकर देहकृत्योपरान्त श्री अंग में स्नान के पूर्व तैल धारण कर रहे थे। तब श्रीगोपीनाथजी स्नान करके आपके पास पधारे तो आपने आज्ञा किया तुम शीघ्र जाकर श्रीठाकुरजी को जगाओ तब आप पितृचरण की आज्ञानुसार श्रीगोवर्धनधर को जगाने पधारे तो देखा कि श्रीनाथजी गाढ़निद्रा में पोढ़ें हैं। यह अलौकिक साक्षात् दर्शन करके आपश्री पुनः लौटकर पधारे और श्रीमहाप्रभुजी से विनती किया कि श्रीजी तो भर निद्रा में पोढ़ें हैं तो कैसे जगावें तब श्रीआचार्यचरण ने उत्तर दिया ‘‘जो तुम छिन ठाड़े रहो। पाछे मंदिर में जायके हाथ की तारी बजाय के श्रीकूँ जगावों कारण जो ब्रह्ममुहूर्त भये पाछे श्रीठाकुरजी कूँ जगावने ऐसी मर्यादा है। तातें अवश्य जगावनें।’’ इत्यादि।

उक्त चरित्र प्रकट करके आपने वैष्णवों में आचार्य वाक्यानुसार भगवत्सेवा करने की मर्यादा का स्थापन किया है। ‘‘सेवाकृर्तिगुरोराज्ञा’’ इसी सिद्धान्त वचन का यह अकृत्रिम भाष्य है।

द्वितीय प्रसंग तो और भी अधिक कठोर है। इस प्रसंग से भगवद् द्रव्य सर्वथा अग्राह्य है। एक बार श्रीगोपीनाथजी ने अपने पितृचरण श्रीमहाप्रभुजी से विनती किया कि श्रीद्वारिकानाथजी को अपने घर पधरावें तब श्रीमहाप्रभुजी ने अति कठोर वचन कहें। ‘‘तुमको बहुत पात्र सामग्री गेहेनां देखिके लोभ भयो होयगो’’ इस अति कठोर आज्ञा को सुनकर भी श्रीगोपीनाथजी विचलित नहीं हुए अपितु और भी अधिक विश्वास एवं विवके धैर्य एवं आश्रय से भरपूर प्रतिउत्तर दिया –‘‘आपके वंश में प्रगट होयगो सो तो लोभ न करेगों, परि हमको तो सेवाही की इच्छा होत है, ताते आपसो यह विनती करी है’’। इस प्रकार ‘‘अस्मत्कुलं निष्कलंकं श्रीकृष्णेनात्मसात्कृंतम्’’ वाले सिद्धान्त वचन का भी यह अकृत्रिम भाष्य है। इत्यादि अपने दिव्यचरित्रों से श्रीगोपीनाथजी ने वैष्णवों एवं आचार्यों के आचरण की अवधि को निर्धारित किया है। किन्तु श्रीगोपीनाथजी के सेवकों के विषय में पर्याप्त जानकारी अप्राप्त है। वार्ता साहित्यानुसार चौरासी वैष्णवन की वार्ता  सं0 17-में देवाकपूर के चार पुत्रों को आपश्री ने शरणमन्त्र का दान किया था जो उल्लिखित है।

श्रीमद्धल्लभाचार्यजी के ज्येष्ठ पुत्र महान् विभूति श्रीगोपीनाथजी की पूरे देश में स्थित एकमात्र बैठक अड़ैल श्रीमहाप्रभुजी की बैठक के परिसर साथ में ही स्थित हैं।