श्रीगुसांईंजी का वाङ्मय-स्वरूप

श्रीगुसांईंजी कृत वाङ्मय-स्वरूप

1) विद्धन्मंडन, 2) अणुभाष्य अंतिम  1.5 अध्याय, 3) निबंध प्रकाश 3 स्कंध से 5 तक, 4) श्री सुबोधिनी जी के उपर टीका श्रीमती टिप्पणीजी, 5) भक्तिहंस, 6) भक्ति हेतु, 7)–  8) गीता प्रथम अध्याय टीका, 9) गीता तात्पर्य, 10) न्यासादेश विवृत्ति, 11) गीता हेतु, 12) गायत्रीकारिका, 13) षोडशग्रन्थ टीका- (क) सिद्धान्त मुक्तावली, (ख) यमुनाष्टक टीका, (ग) नवरत्न प्रकाश, (घ) सिद्धान्त रहस्य विवरण, 14) श्रृंगार रस मण्डन, 15) रस सर्वस्व, 16) व्रतचर्या, 17) स्वप्न दर्शन, 18) गुप्तरस, 19) सेवान्हिक, 20) श्रीवल्लभाष्टक, 21) श्री सर्वोत्तम स्तोत्र, 22) श्रीस्फुरत् कृष्ण प्रेमामृत (श्री स्फुरत्कृष्ण प्रेमामृत), 23) श्रीगोकुलाष्टक, 24) श्रीस्वामिन्याष्टक, 25) स्वामिनी स्तोत्र, 26) भुजंग प्रयाताष्टक, 27) ललित त्रिभंगी स्तोत्र, 28) आर्या, 29) श्रीयमुनाष्टक पदी, 30) विज्ञप्ति, 31) प्रबोध, 32) चतुःश्लोकी, 33) प्रेमामृत भाष्य, 34) वृत्रासुर चतुःश्लोकी टीका, 35) प्रेंखपर्यंक शयनम् (पालना), 36) मंगलमंगलम्, 37) भावैरंकुरितम्, 38) सौन्दर्यंनिज हृदगतम्, 39) गद्यार्थ, 40) जन्माष्टमी निर्णय, 41) रक्षा स्मरण, 42) रामनवमी निर्णय, 43) अष्टाक्षर निरूपण, 44) गीत गोविंद प्रथमाष्टपदी टीका, 45) पत्र 46) श्रीवल्लभ नामावली, 47)  पुरुषोत्तम प्रतिष्ठा प्रकार।

विद्धन्मण्डन -(1) इस ग्रन्थ में शुद्ध अद्वैत तत्त्वज्ञान के सिद्धान्तों का बहुत सुन्दर शौली में निरूपण किया है, सर्वत्र शुद्ध ब्रह्म ही इस ब्रह्माण्ड में विलस रहा है। उनके चित् और आनन्द का तिरोधान होने से जगत बना हुआ है। केवल आनन्द का तिरोधान होने से जीवन (बना) हुआ है और अपने अगणित आनन्द का कुछ तिरोधान करके गणितानन्द में से आप अंतर्यायी हुए हैं। जगत सत्य है, ब्रह्म उस जगत का समवायि और निमित्त कारण है, जीव और ब्रह्म का अंशाशिभाव का संबंध है। ब्रह्म साकार और निराकार उभय है वह आनन्द स्वरूप से साकार है और प्राकृतधर्म से रहित होने के कारण निराकार है और वो परिणाम विकार रहित है, जगत सत्य है क्योंकि वो ब्रह्म की कृति है, परन्तु संसार जो जीव के अहंत्ता ममता से उत्पन्न हुआ है वो मिथ्या है। भगवान के ऐश्वर्यादि 6 गुणों का तिरोधान होने से जीव को दुःखादि छह दोषों की प्राप्ति हुई है, परन्तु प्रभु की भक्ति करने से वो मूल स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। ब्रह्म प्राप्ति का मुख्य साधन ज्ञान नहीं अपितु भक्ति ही है, इ. अनेक सिद्धान्तों का इसमें प्रतिपादन है, वास्तविक यह ग्रन्थ विद्वानोंका भूषण है। यह ग्रन्थ श्रीविट्ठलेश्वर का अद्वितीय तात्त्विक ज्ञान का निर्देषन रूप है।

(2) अणुभाष्य – यह ग्रन्थ तो उत्तर मीमांसा अगर (और) ब्रह्मसूत्र उपरका भाष्य है। यह ग्रन्थ श्रीमदाचार्यचरणों ने 2।। अध्याय तक लिखा है और आगे का डेढ़ अध्याय प्रभुचरण ने लिखा है। आचार्यश्री की भाषा सरल, गंभीर और संक्षिप्त है जबकि श्रीविट्ठलेश्वर की भाषा ठोक और पांडित्यपूर्ण तथा लम्बे विस्तारवाली है। भाष्य के अन्त में ‘‘भाष्य पुष्पांजलि श्रीमदाचार्यचरणांबुज। निवेदिस्तेन तुष्टा  भवन्तु मयि ते सदाः“ ये श्लोक श्रीविट्ठलेश्वर की सुन्दर कृति सिद्ध करता है।

(3) निबन्ध प्रकाश – अणुभाष्य की तरह आचार्यश्री ने यह ग्रन्थ भी तीसरे भाग (भागवतार्थ प्रकरण) का तीन स्कंध तक ही रचना की है बाकी का अपूर्ण अंश (तीन स्कंध से 5 स्कंध तक) श्रीविट्ठलेश्वरजी ने रचना की है।

(4) भक्ति हंस – यह भक्ति हंस तथा भक्ति हेतु भक्ति निर्णय और भक्ति जीवन को रचने का कारण आगे बताया है, इस ग्रन्थ में भक्ति का स्वरूप समझाया है और वो कर्म और ज्ञान से श्रेष्ठ है ये सिद्ध किया है, इसमें नवधा भक्ति को सगुण साधन रूप मानकर दसवीं प्रेमलक्षणा को निर्गुण और ब्रह्म प्राप्तिके मुख्य द्वार रूप माना है, निर्गुण भक्ति एक साध्य भक्ति है, माहात्म्यज्ञान पूर्वक सबसे अधिक और सुदृढ़ निरूपाधि स्नेह भगवान के प्रति होना उसे भक्ति की व्याख्या देने में आयी है। भक्ति सम्पन्न जीवों (भक्त) कभी मुक्ति को चाहते नहीं। ये इसमें अच्छे से समझाया है। इस पुष्टि भक्ति में भी प्रवाह, मर्यादा, पुष्टि और शुद्ध पुष्टि ऐसे (चार) 4 भाग हैं। सबसे श्रेष्ठ भक्ति की पराकाष्ठा व्रज सीमन्तिनीयों में थी।

(5) श्रृंगार रस मण्डन – पुष्टिमार्ग में परब्रह्म को रसात्मक स्वरूप माना गया है। वेद की श्रुतियों ने उस ब्रह्म का रस रूप वर्णन किया है। रसो वैसः लब्ध्वानन्दी भवति। इस रसात्मक ब्रह्म को कृष्ण कहा गया है। आठ प्रकार के रसों में श्रृंगार रस सबसे श्रेष्ठ है, श्रृंगार रस के अधिष्ठाता विष्णु हैं ऐसा वात्स्यायन सुत्र में कहा है तो उस रसात्मक कृष्णचंद्र की जीव को प्राप्ति किस तरह हो सकती है। इस संबंधी गुप्त रहस्य का बोध इस ग्रन्थ में किया है। जयदेवजी के गीत गोविंद की तरह इसमें भी रसेश श्रीकृष्ण चंद्र की रासलीला का वर्णन किया है। भक्तिभाव को पोषण देने के लिए भक्तों का रस क्या है ये समझना चाहिए। इसलिए पद्यात्मक काव्य द्वारा इसमें सविस्तार निरूपण किया है।

(6) श्रीकृष्ण प्रेमामृत – यह ग्रन्थ श्रीस्वामिनीजी ने विप्रयोग अवस्था में अपने नख (नाखुन) द्वारा श्रीगिरिराजजी की एक शिला पे लिखा है। (यह आज भी गोविन्द घाटी पर विद्यमान है और उसमें जो संकेत देखने में आते हैं अत्यद्भुत हैं) उसमें श्रीकृष्ण के 108 नामों का उल्लेख है। यह ग्रन्थ आचार्यजी को सर्वप्रथम प्राप्त हुआ और भगवद् आज्ञा से उसकी एक नकल आपने कृष्ण चैतन्य को दी। उसी समय से गोडिया लोग उसे कृष्ण चैतन्य रचित मानते हैं। परन्तु गोविन्द कुण्ड पर की श्रीआचार्यश्री की बैठक के चरित्र में इसका स्पष्ट उल्लेख है। इस पर श्रीविट्ठलेश्वरजी ने सम्पूर्ण भावोद्बोधक विवृत्ति लिखी है, इससे भी निश्चय  होता है कि यह ग्रन्थ आचार्यश्री द्वारा ही प्रकट हुआ है। इसकी विवृत्ति श्रीगुसाईंजी ने ब्रज के प्रेम सरोवर में (संकेत के पास) लिखी है।

(7) श्रीमती टिप्पणीजी- श्रीविट्टलेश्वर ने श्री रास पंचाध्यायी की सुबोधिनीजी पर की टिप्पणीजी करहला स्थान पर की है। और श्री वेणुगीत के श्रीसुबोधिनीजी उपर का श्रीटिप्पणीजी का भाग बच्छ वन में लिखा है। इसमें श्रीसुबोधिनीजी  के गूढ़ और सुन्दर भावों को कमनीय भाषा में प्रस्तुत किया है

(8) व्रतचर्या ग्रन्थ – ये चीरघाट पे, श्रीपुरुषोत्तम उल्लास- बेलवन में और दानलीला ग्रन्थ रीठौरा में रचना की। उसकी पूर्ति असारवा में सं0 1613 में की है।

(9) गुप्तरस – इसमें प्रभु के रस का गुप्त रूप से वर्णन करने में आया है। इस ग्रन्थ पर श्रीगोकुलनाथजी की टीका भी है।

(10) स्वामिनी प्रार्थनाष्टक- इसमें श्री विट्ठलेश्वरजी ने अखंड और अभेद्य रसात्मक शुद्ध निर्गुण प्रेम का वर्णन एक अष्टक द्वारा किया है।

(11) विज्ञप्तियाँ – इसमें श्रीविट्ठलेश्वरजी ने अपने प्राण प्रेष्ठ के प्रति अपने हृदय की उर्मियाँ और उसके सम्बन्ध का विरह ताप और क्लेश का आनंदानुभव प्रकट किया है।

(12) आर्या – श्रीविट्ठलेश्वरजी ने राजभोग आरती की आर्या (व्रजराज विराजित घोषवरे)

आचार्य श्रीजी विद्यमान तामे सं0 1582 में दस वर्ष की आयु में अड़ेल में की हती। उसका उल्लेख निजवार्ता में स्पष्ट है। मंगलार्ति की आर्या परमानन्द दासजी के लिए सं0 1625 में की थी। यही एक आर्या के पाठ का अधिकार वैष्णवों को प्राप्त है। अन्य आर्याओ के पाठ का अधिकार गोस्वामी बालको के सिवाय किसी को  नहीं। अन्य दो आर्याओ अपने सुपुत्रोंके लिए लिखी है।