प्रभुचरण श्रीविट्ठलनाथजी श्रीगुसाँईजी

प्रभुचरण श्रीविट्ठलनाथजी श्रीगुसाँईजी

श्री विट्ठलेश महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी के द्वितीय पुत्र थे। आपके ज्येष्ठ भ्राता का नाम श्री गोपीनाथजी था। आपके मातृचरण श्री महालक्ष्मीजी-अक्काजी थे।

प्राकट्य काल – वि0सं0 1572 के पौष कृष्ण नवमी और भृगुवार के दिन चरणाट में आपका प्राकट्य हुआ था। आज भी वहाँ आपके प्राकट्य स्थान पर आपकी बैठक है।

आपके प्राकट्य की कुण्डली इस प्रकार है

 

यज्ञोपवीत- श्री विट्ठलेश का यज्ञोपवीत-संस्कार आपको आठ वर्ष की आयु में वि.सं. 1580 में काशी के श्रीआचार्यचरण द्वारा सम्पन्न हुआ था।

विद्याध्ययन- आपकी प्रतिभा एवं मेंधा बाल्यकाल से ही ज्वाजल्यमान् थी। आपका अध्ययन उस युग के प्रकांड पंडित माधव जी के यहाँ प्रयाग में हुआ था। आप ‘सरस्वती जी’ से जो भी कुछ सुनते थे उसे एक बार के श्रवण मात्र से सब धारण कर लेते थे। आपकी निजवार्ता’ में लिखा है कि आप अपने पढ़ने की पुस्तकें भी ‘सरस्वती जी’ के यहाँ पर ही छोड़ कर सायंकाल को अड़ैल आ जाते थे। घर आकर आप आचार्य चरण से श्री मद्भागवत का अध्ययन करते थे। आपने अपने दसवें वर्ष में ‘‘व्रजराज विराजित घोष वरे“ इस ‘राज भोग आर्या’ की रचना कर आचार्य चरण को सुनाई थी। इस पर आचार्य चरण ने संतुष्ट होकर आपको आशीर्वाद दिया था।

महाप्रभु वल्लभाचार्यजी का तिरोधान वि0स0 1587 में हुआ था। उस समय आपके ज्येष्ठ पुत्र श्रीगोपीनाथजी 15 वर्ष के थे।

विवाह- आपका विवाह वि0स0 1589 में काशी में विश्वनाथ भट्ट बागरौदी की कन्या श्रीरुक्मिणीजी से हुआ था।

ब्रज यात्रा- वि0सं0 1599 में आपके बड़े भ्राता श्रीगोपीनाथजी का जगदीशपुरी में श्री जगन्नाथ जी के मुख में प्रवेश हुआ था। उसके अनंतर वि0सं0 1600 में भाद्रपद कृष्णा 12 को आपने सह-कुटुम्ब एक ब्रजयात्रा की थी। यों तो आपने वि0सं0 1595 में भी श्री गोपीनाथजी के साथ ब्रजयात्रा की थी किन्तु यह यात्रा आपने स्वतन्त्र रूप से सर्व प्रथम की थी। इसलिए इस यात्रा का सम्पूर्ण वृतान्त चतुर्थ पुत्र श्रीगोकुलनाथजी द्वारा पीछे से संकलित हुआ है। इस प्रकार यह वि0सं0 1600 की यात्रा प्रसिद्ध हुई। आपने ऐसी ही ब्रजयात्रा वि0सं0 1628 में श्रीगोकुल में स्थायी वास करने के अनंतर ही की थी इस समय कुछ वैष्णव उनके साथ थे चतुर्थ पुत्रश्रीगोकुलनाथजी भी इस यात्रा में सम्मिलित हुए थे।

सेवा विस्तार- वि0सं0 1602 में आपने आचार्यचरण प्रकटित सेवा का भोग, राग, श्रृंगार से भगवदाज्ञानुसार विस्तार किया था और नेग आदि बाँधे थे।

गृहस्थाश्रम- जैसा कि पहले कहा गया है कि वि0सं0 1589 में श्री विट्ठलेश का ब्याह श्रीरुक्मिणीजी से हुआ था। उनसे आपको 6 पुत्र और 4 पुत्रियाँ प्राप्त हुईं। जिनके नाम एवं प्राकट्य समय इस प्रकार हैं -

पुत्रोंके नाम प्राकट्य समय

1- श्री गिरधरजी वि.सं. 1597 कार्तिक शुक्ला 12

2- श्री गोविन्दजी ,, ,,   1599 अगहन कृष्ण 8

3- श्री बालकृष्णजी ,, ,,  1606 आश्विन ,, 13

4- श्री गोकुलनाथजी ,, ,, 1608 अगहन शुक्ला 7

5- श्रीरघुनाथजी    ,, ,,  1611 कार्तिक शुक्ला 12

6- श्री यदुनाथजी   ,, ,,  1615 चैत्र शुक्ला 6

पुत्रियों के नाम

1- श्री शोभाजी वि.सं. 1595

2- श्री कमला ,, ,, 1601

3- श्री देवका ,, ,, 1603

4- श्री यमुना ,, ,, 1613

वि.सं. 1616 के पश्चात  श्रीरुक्मणिजी बहूजी का लीला प्रवेश हुआ था। उसके अनन्तर वि.सं. 1620 में जब श्री गुसाँईजी सहकुटुम्ब गढा में विराजते थे तब दुर्गावती रानी के आग्रह से आपने पद्मावती नाम की एक सजातीय कन्या से दूसरा विवाह किया था। उनसे आपको एक पुत्ररत्न प्राप्त हुआ था जिनका नाम श्रीघनश्यामजी रखा गया। आपका प्राकट्य वि.सं. 1628 के अगहन कृष्ण 13 को हुआ।

इस प्रकार श्री विट्ठलेशजी के ग्यारह संतानें 7 पुत्र एवं 4 कन्याएं थीं।

वि0 1638 में आपके यहाँ श्रीआचार्यजी के सेव्य ये सात स्वरूप भेले हो चुके थे – 1-श्रीमथुरानाथजी 2-श्रीविट्ठलनाथजी 3-श्रीद्वारिकानाथजी 4-श्रीगोकुलनाथजी 5-श्रीगोकुलचन्द्रमाजी 6-श्रीबाल कृष्ण जी 7-श्रीमदनमोहनजी।

सात स्वरूपों का परिचय-

इन सात स्वरूपों का परिचय इस प्रकार है -

1 श्रीमथुरानाथजी

वि0सं0 1559 में आचार्यजी जब गोवर्धनसे श्रीनाथजी की सेवा कर कर्णावल पधारे थे तब फाल्गुन शुक्ल 7 को जमुना जी के कराडा टूटने पर उसमें से इनका प्राकट्य हुआ था। उस समय पद्मनाभदास साथ थे उनने आपसे इस स्वरूप को सेवा के लिए मांगा तब उनको पधराते हुए आचार्यजी ने कहा कि जब तुमसे सेवा न हो सके तब इनको हमारे यहाँ पधरा जाना।

फिर पद्मनाभदास ने अपने घर कन्नौज में ले जाकर आजीवन श्रीमथुरानाथजी की सेवा की थी। उनके बाद उनके परिवार में भी बेटी तुलसा, बेटा की बहू पार्वती, नाती रघुनाथदास इत्यादि ने भी उसी प्रकार सेवा की। बाद में वि0सं0 1638 के पूर्व गृह में कोई सेवा करने वाला न होने से श्रीमथुरानाथजी श्रीगुसाँई जी के यहाँ श्रीगोकुल पधारे थे। जो परम्परा से अब उनके कुल में आज तक विराजमान हैं।

2-श्रीविट्टलनाथजी

वि0सं0 1572 के पौष कृष्णा नवमी के दिन जब श्री विट्टलनाथजी श्री गुसाँईजी का प्राकट्य हुआ उसी समय आचार्यजी को दक्षिण का एक ब्राह्मण भेंट स्वरूप श्रीमद्भागवत एवं श्रीविट्ठलनाथजी ठाकुर दे गया। तब आचार्यजी ने कहा स्वामी एवं सेवक दोनों रूपों से श्रीविट्ठलनाथजी पधारे। यह स्वरूप किसी वैष्णव को सेवा के लिए आज तक नहीं पधराये हैं। ये आचार्यजी के घर में ही आज तक विद्यमान हैं।

3-श्रीद्वारकानाथजी

वि0सं0 1552 के आस पास जब श्रीआचार्यजी कन्नौज पधारे थे तब वहाँ के प्रसिद्ध राज्यपुरुष  दामोदरदास सम्भल वाले को कन्नौज के एक दरजी के पास से मोल लेकर यह स्वरूप सेवा के लिये पधरा दिया था। फिर वि0सं0 1577 में दामोदर दास और उनकी स्त्री के निधन होने पर आचार्यजी की विद्यमानता में ही यह स्वरूप अड़ेल में आचार्य गृह में पधरा दिया गया था। बाद में वि0सं0 1621-22 में जब श्रीविट्ठलनाथजी अड़ेल से गोकुल आये तब अन्य स्वरूपों के साथ इन्हें भी पधरा लाये थे। तब से यह स्वरूप आचार्य गृह में परम्परा से विराज रहे है।

4-श्रीगोकुलनाथजी

यह स्वरूप श्रीआचार्यजी के श्वसुर की पूजा में था। वि0सं0 1566 में आचार्यजी अपने बहूजी महालक्ष्मी के द्विरागमन के समय इन्हें भी अड़ैल ले आये थे। यह स्वरूप तब से आज तक आचार्य गृह में ही विराजमान है। ये किसी वैष्णव के माथे नहीं पधारे हैं।

5-श्रीगोकुलचन्द्रमाजी-

यह स्वरूप श्रीआचार्यजी की सेवकनी-महावन की एक क्षत्राणी को श्रीयमुनाजी में से प्राप्त हुए चार स्वरूपों में से-

(1) श्री नवनीतप्रियाजी (2) श्रीगोकुलचन्द्रमाजी (3) श्रीलाडलेशजी (4) श्री त्रिभंगीरायजी में से एक हैं। वि0सं0 1559 में जब श्रीआचार्यजी महावन पधारे तब उस क्षत्राणी ने इन चारो स्वरूपों को आपको भेंट कर दिए। तब श्रीगोकुलचन्द्रमाजी को आपने महावन के नारायणदास ब्रह्मचारी को सेवा के लिए दिए थे। फिर वि0सं0 1630 के आस पास यह स्वरूप श्रीगुसाँईजी के गृह में आया। तब से इनके कुल में ही वंश परम्परा से विराजते हैं। आज तक।

6-श्रीबालकृष्णजी –

यह स्वरूप श्रीआचार्यजी को श्रीगोकुल के कर्णवेध कूप से प्राप्त हुआ था। तब से आज तक आपके वंश में ही विराजते हैं।

7-श्रीमदनमोहनजी –

यह स्वरूप आचार्यजी के पूर्वजों को यज्ञ में से प्राप्त हुआ था। तब से आपके वंश में ही परम्परा से विराजते हैं।

इन सातों स्वरूपों को श्रीविट्ठलनाथजी ने कई समय अन्नकूट आदि उत्सवों पर श्रीनाथजी के साथ पधराये थे। इससे सम्प्रदाय में इन स्वरूपों की प्राधान्यता मानी जा रही है। श्रीविट्ठलनाथजी ने जतीपुरा में और गोकुल में सात-सात मन्दिर (गृह) बनवा कर इन सात स्वरूपों को प्रतिष्ठित किये थे। फिर बंटवारे के समय अपने सात पुत्रोंको एक-एक स्वरूप इस प्रकार पधरा दिया।

1 श्रीगिरधरजी को श्रीमथुरानाथजी

2 श्रीगोविन्दरायजी को श्रीविट्ठलनाथजी

3 श्रीबालकृष्णजी को श्रीद्वारकानाथजी

4 श्रीगोकुलनाथजी को श्रीगोकुलनाथजी

5 श्रीरघुनाथजी को श्रीगोकुलचन्द्रमाजी

6 श्रीयदुनाथजी को श्रीबालकृष्णजी श्रीगुसाईंजी ने श्रीबालकृष्णजी पधराने का विचार किया परन्तु उन्होंने उन स्वरुप को स्वीकार नहीं किया अतः आप को कोई भी स्वरुप की प्राप्ति श्रीगुसाईंजी के समय नहीं हुई ।

7 श्रीघनश्यामजी को श्रीमदनमोहनजी

अन्य निधि स्वरूपें-

इन सातों ठाकुर स्वरूपों के अतिरिक्त श्रीआचार्यजी के अन्य भी कई सेव्य-स्वरूप थे। उन सबको श्रीनवनीतप्रियजी और श्रीनाथजी के यहाँ ग्वालमंडली में अथवा उनके साथ पधरा दिये। और उन पर बड़े पुत्र श्री गिरधरजी का अधिकार रहा। आगे चलकर श्री गिरधरजी का वंश ज्यों-ज्यों फैला त्यों-त्यों उनमें से भी कई बँटवारे हुए जिसके फलस्वरूप आज सम्प्रदाय में गोस्वामियों के अनेक घर हुए हैं जो मन्दिर कहलाते है। इन सबमें 84, 252 वैष्णवों के घर से आये हुए सेव्य स्वरूप एवं श्रीविट्ठलनाथजी के सेव्य स्वरूप विराज रहे हैं। इन सेव्य निधि स्वरूपों की विशेषता में शंखनाद, श्रृंगार आदि की कई विशिष्ट प्रणाली सम्प्रदाय में परम्परा से प्राप्त हैं जिनसे इनका प्रतिनिधित्व जाना जा सकता है।

तिरोधान-

वि0सं0 1642 के माघ कृष्णा 7 के दिन आपने श्रीगिरिराजजी के मुखारविन्द निकट ही कन्दरा में गोविन्दस्वामी सहित प्रवेश किया और श्रीनाथजी के स्वरूप में लीन हो गए।

आपने संस्कृत में इन ग्रंथों की रचना की है-

1 विद्धन्मंडन  2 अणुभाष्य के अन्तिम 11 अध्याय पर भाष्य 3 निबन्ध पर प्रकाश 3 से 5 स्कन्ध तक 4 सुबोधिनी पर श्री टिप्पणीजी 5 भक्तिहंस 6 भक्तिहेतु निर्णय 7 भक्ति जीवन 8 गीता प्रथम अध्याय पर टीका 9 गीता तात्पर्य 10 न्यासादेश विवृत्ति 11 गीता हेतु 12 गायत्री कारिका 13 षोडशग्रंथो पर टीका (अ) सिद्धान्त मुक्तावली पर (ब) यमुनाष्टक पर (क) नवरत्न प्रकाश (ख) सिद्धान्त रहस्य विवरण 14 श्रृंगाररस मण्डन (अ) उल्लास (ब) रस सर्वस्व (क) व्रतचर्या 15 स्वप्न दर्शन 16 गुप्तरस 17 सेवानिकुन्ज 18 श्रीसर्वोत्तम स्तोत्र 19 श्रीवल्लभाष्टक 20 श्रीस्फुरत्कृप्णप्रेमामृत 21 गोकुलाष्टक 22 स्वामिन्याष्टक 23 स्वामिनीस्तोत्र 24 भुंजग प्रयाताष्टक 25 ललितत्रिभंगीस्तोत्र 26 श्रीयमुनाष्टपदी 27 मंगलाआर्या (मंगल मंगलम्) 28 श्रृंगारार्तिकीआर्या 29 राजभोगार्ति की आर्या 30 संध्यार्ति की आर्या 31 शयनार्ति आर्या 32 विज्ञप्ति 33 प्रबोध 34 चतुश्लोकी 35 प्रेमामृत भाष्य 36 वृत्रासुरचतुःश्लोकी-टीका 37 प्रेखपर्यंक शयनम् (पलना) 38 भावैरंकुरितम् 39 सौंदर्यनिज हृदगतम् 40 गद्यार्थ 41 जन्माष्टमी निर्णय 42 रामनवमी निर्णय 43 गीत गोविन्द प्रथमाष्टपदी टीका 44 अष्टाक्षर निरूपणम् 45 स्वआत्म सुमेंभ्य पत्र 46 रक्षास्मरण 47 श्रीवल्लभ नामावली 48 भक्तिनिर्णय 49 पुरुषोत्तम प्रतिष्ठा प्रकार

श्रीविट्ठलनाथजी का परिवार -

श्रीविट्ठलनाथजी की उपस्थिति तक आपके परिवार में ये व्यक्ति विद्यमान थे।

सात पुत्र्-

श्रीगिरिधरजी, श्रीगोविन्दजी, श्रीबालकृष्णजी, श्रीगोकुलनाथजी, श्रीरघुनाथजी, श्रीयदुनाथजी, श्रीघनश्यामजी ।

सात पुत्रवधू क्रमशः -

भामिनी, श्रीराणी, कमला, पार्वती, जानकी, श्रीमहारानी, कृष्णावती।

पुत्रियें-

शोभा कमला देवका यमुना।

इनके जन्म सम्वत पूर्व में लिख चुके हैं।

पौत्र-

(1) श्रीगिरधरजी के तीन पुत्र और तीन कन्यायें थीं।

1 श्रीमुरलीधरजी- वि0सं0 1630

2 श्री दामोदर जी वि0सं0 1635 में श्री ये मथुरानाथजी के गृहाधिपति हुए।

कन्याओ के नाम- (1) श्रीवेणी बेटी (2) श्रीमहालक्ष्मी बेटी (3) श्रीसुभद्रा बेटी।

(2) श्रीगोविन्दरायजी के चार पुत्र और दो कन्याएं थीं।

श्रीकल्याणरायजी प्रा0 सं 1633, गोकुलउत्सव जो प्रा0सं0 1635, कृष्णरायजी प्रा0सं0 1637 लक्ष्मीनृसिंहजी प्रा0सं0 1640

कन्याओ के नाम- (1) श्रीरूक्मणीजी (2) श्रीरामकुँवरजी (3) श्रीबालकृष्णजी के 6 पुत्र और 1 कन्या थी।

(3) श्रीबालकृष्णजी के 6 पुत्र और एक कन्या थी। श्री द्वारकेशजी प्रा.सं. 1629 श्री ब्रजनाथजी प्रा.सं. 1632 ब्रजभूषणजी प्रा.सं. 1636 श्री पीतांबरजी प्रा.सं. 1639 श्री ब्रजालंकारजी प्रा.सं. 1642 श्री पुरुषोत्तमजी प्रा.सं. 1644 कन्या का नाम-श्रीगोपबेटी (देवका)

(4) श्रीगोकुलनाथजी के तीन पुत्र और एक कन्या थी। श्रीगोपालजी प्रा.सं, 1642 श्रीविट्ठलरायजी प्रा.सं.1645 श्रीवृजोत्सवजी प्रा.सं. 1650 कन्या का नाम-श्री रोहिणीजी

(5) श्रीरघुनाथजी के 5 पुत्र और एक कन्या थी। श्रीदेवकीनन्दनजी प्रा.सं. 1634 श्रीगोपालजी प्रा.सं. 1637 श्रीजयदेवजी प्रा.सं. 1638/1645 श्री जशोदानन्दनजी प्रा.सं. 1648 श्रीद्वारकानाथजी प्रा.सं. 1650 कन्या का नाम- श्रीयमुनाजी।

(6) श्रीयदुनाथजी के पाँच पुत्र और एक कन्या थी। श्रीमधुसूदनजी प्रा.सं. 1634 श्री रामचन्द्रजी प्रा.सं. 1638 श्री जगन्नाथजी प्रा.सं. 1642 श्रीबालकृष्णजी प्रा.सं. 1644 श्रीगोपीनाथजी प्रा.सं. 1647 कन्या का नाम-श्रीदमयन्तीजी

(7) श्रीघनश्यामजी के दो पुत्र और एक कन्या थीं। श्रीब्रजपालजी प्रा.सं. 1659 श्रीगोपेन्द्रजी प्रा.सं. 1662 कन्या का नाम-श्रीजानकीजी

इस प्रकार श्रीविट्ठलनाथजी के 28 पौत्र थे। 10 पौत्रियाँ थी।