श्रीगोपीनाथजी

श्री गोपीनाथजी

 

श्री गोपीनाथजी श्री वल्लभाचार्यजी के ज्येष्ठ पुत्र है। आपश्री का प्राकट्य वि.सं. 1598 मि. आश्विन कृ0 12 को प्रयाग संगम के निकट स्थित देवर्षि  गाँव (देवरख) के पास अलर्कपुर (अड़ैल) में हुआ। जहाँ आज भी आपश्री की बैठक तथा सूतिका गृह स्थित है। अड़ैल में आप श्री बाल-स्वरूप से विराजमान है।

आपश्री का यज्ञोपवीत श्री वल्लभाचार्यजी ने वि.स. 1573 के चातुर्मास्य के बाद काशी में विधिवत् सम्पन्न किया। उपनयन संस्कार के बाद आपश्री ने प्राचीन परम्परानुसार वेद-वेदान्त और शास्त्रों का अध्ययन किया तथा साम्प्रदायिक ग्रन्थों का विशेषकर अणुभाष्य, सुबोधिनी आदि का अध्ययन आपश्री ने पित्रृचरण श्रीमहाप्रभुजी से किया। आपश्री का विवाह श्रीमहाप्रभुजी की उपस्थिति में ही वि.स. 1581 से 1584 के बीच सम्पन्न हुआ।

आपश्री के 2 सन्तति हुई: (1) पुत्र श्री पुरुषोत्तमजी प्रा. वि.सं. 1588 मि. आश्विन कृष्णा अष्टमी। कुछ इतिहासज्ञ सं. 1587, 1589 अथवा 1608 भी मानते है। (2) पुत्री श्री सत्यभामा बेटीजी प्रा. मि.सं. 1598 मि. का.शु. 7 अड़ैल कुछ इतिहासज्ञ 3 सन्तति मानते है। तृतीय लक्ष्मी बेटीजी।

श्रीमहाप्रभुजी के लीला प्रवेश के बाद श्री वल्लभाचार्यजी की गद्दी पर श्री गोपीनाथजी विराजे।

श्री वल्लभाचार्य के नित्य लीला प्रवेश के बाद उनकी आवष्यक उत्तरक्रिया से निवृत्त होकर आप श्री ने अपने कनिष्ठ भ्राता एवं माताजी सहित अड़ैल आकर निवास किया।

श्रीनाथ जी की सेवा में से बंगाली ब्राह्मणों का निष्कासन

आप श्री जब सपरिवार अड़ैल में निवास करते थे तब कृष्णदास अधिकारी ने पत्र लिखकर बंगालियों की शिकायत किया। तब श्रीगोपीनाथजी एवं श्रीविठ्ठलनाथजी दोनों भ्राता तुरन्त गोपालपुरा (जतीपुरा) पधारे और वि.सं. 1590 मि. कार्तिक शु. 9 के दिन श्रीमदनमोहन जी का स्वरूप नारायण भट्ट से लेकर उन बंगालियों को सेवार्थ प्रदान किया तथा श्रीनाथ जी की सेवा छोड़ने का उन्हें आग्रह किया। परन्तु जब वो नहीं माने तब अचानक एक दिन उनकी झोंपडि़यों में आग लगी तब वे बंगाली सब सेवा छोड़कर भागे उसी अवसर का लाभ लेकर अधिकारी कृष्णदास ने अन्य सेवक साँचीहर ब्राह्मणों को सेवा में प्रवेश करा दिया। इस प्रकार मन्दिर का नया प्रबन्ध करके आप श्री गोकुल होते हुए वापिस अड़ैल पधारें।

श्रीनाथ जी की सेवा में विशेषतः आप दोनों भ्राताओं ने ऐसा क्रम बाँधा था कि क्रमशः दोनों (अड़ैल एवं जतीपुरा) गोपालपुरा बारी-बारी से विराजते थे।

आपश्री ने श्रीनाथजी के लिये लगभग 1 लक्ष रूपये द्रव्य से स्वर्ण, चांदी के बर्तन तथा आभूषण  आदि सिद्ध करवाये थे। एतदर्थ आपने गुजरात सिंध आदि की यात्रा भी किया था। वि.सं. 1595 में आपश्री ने जगदीश पुरी की यात्रा की। वहाँ पर आपश्री ने श्री वल्लभाचार्यजी द्वारा मानित ’गुच्छिकार कृष्णदास’ को ही अपना वंश परम्परा का पुरोहित माना तथा उसे वृत्ति पत्र भी लिखा। वि.स. 1605 में जब आपश्री श्री विठ्ठलनाथजी के ज्येष्ठ पुत्र श्रीगिरिधरजी के यज्ञोपवीत पर काशी पधारे थे तदनन्तर तुरन्त आपश्री ब्रज पधारे एवं 4 कोस की व्रज   परिक्रमा किया वि.सं. 1618 के लगभग (आस-पास) आपश्री ने गुजरात, सिन्ध द्वारिका आदि प्रान्तों की यात्रा की थी। आपश्री ने दो यज्ञ किये थे। प्रथम वि.सं. 1601 में सोमयज्ञ किया। तदनन्तर विष्णु याग भी आपश्री ने किया। ये दोनों यज्ञ अड़ैल में ही किये थे।

श्रीगोपीनाथजी द्वारा रचित साधन दीपिका’ एवं सेवाविधि नाम के दो ग्रन्थ प्राप्त है। श्रीगोपीनाथजी एवं श्री विट्ठलनाथ जी इन दोनों भाइयों में परस्पर सौहार्द अच्छा था। यह आपके पारस्परिक लिखें गये पत्रों से मालूम होता है। आप दोनों पत्र व्यवहार संस्कृत भाषा में तथा कुछ तेलगू भाषा में भी किये हुये है।

आपश्री के एक मात्र पुत्र श्रीपुरूषोत्तमजी के विषय में विशेष जानकारी प्राप्त नहीं होती है। वैसे श्रीपुरूषोत्तमजी का लीला प्रवेश भी जल्दी हो गया था। श्रीगोपीनाथजी गुजरात पधारें तब श्रीपुरूषोत्तमजी श्रीगुसांईजी के पास ही रहे थे। परन्तु श्रीगोपीनाथजी के गुजरात से वापिस पधारने से पूर्व ही वि.सं. 1620 के लगभग (आस-पास) श्रीपुरूषोत्तमजी का लीला प्रवेश हुआ।

अपने पुत्र के लीला प्रवेश के बाद आपश्री ने सम्प्रदाय का उत्तरदायित्व श्रीविठ्ठलनाथजी को सौंप दिया और स्वयं वि.सं. 1620 में जगदीशपुरी की यात्रा पर पधारें। वहाँ पर ही आपश्री श्री बलदेवजी के मुखारविन्द में सदेह प्रविष्ट हो गये। आपश्री के लीला प्रवेश के विषय में इतिहासकारों में बहुत मत प्राप्त होते है। कुछ इतिहासकार 1589, कुछ 1610 तथा कुछ 1620 मानते है।

श्रीगोपीनाथजी के एक व्रजयात्रा का वर्णन कुछ प्राप्त होता है। आपश्री की एक मात्र बैठक अड़ैल में है। श्रीगोपीनाथजी नित्यप्रति सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ कर के ही भोजन ग्रहण करते थे। इस अत्यन्त कठोर नियम के कारण आपश्री को तथा आपश्री के परिवार को बहुत कष्ट होता था। अतः श्रीमहाप्रभुजी ने कष्ट निवारणार्थ तथा नियमरक्षणार्थ ’श्रीपुरुषोत्तम सहस्त्रनाम’ ग्रन्थ की रचना किया जिसके पाठ से सम्पूर्ण भागवत् पाठ का फल प्राप्त होता है। यह ग्रन्थ आपश्री ने श्रीगोपीनाथ जी के लिये ही बनाकर उनको दिया और आज्ञा किया कि अबसे आप नित्य इसका पाठ करके भोजन ग्रहण किया करें। इससे सम्पूर्ण श्रीभागवत् पाठ का फल आपको मिलेगा। तब से श्रीगोपीनाथ जी उसी का पाठ नित्य करने लगे। इसलिये आज भी पुष्टिमार्ग में वैष्णवों के लिये इस स्तोत्र का पाठ आवष्यक है। इस पाठ से सम्पूर्ण भागवत पाठ का फल प्राप्त होता है।